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#व्यंग्य बखानू बबा की बकबक : आंदोलन में रोटियाँ सेंकना

टिकोरी सरकार की नीतियों से खफा था। खफा होना भी चाहिए। प्रधानमंत्री साहब ने कहा था की जीतकर आएंगे और आते ही मंदिर बनवाएंगे और उससे पहले युवकों को रोजगार दिलवायेंगे। इसी चक्कर में टिकोरी उत्तम्मा - मध्यम्मा करके एम ए की डिग्री भी ले आया लेकिन नौकरी का कोई अता - पता नहीं है और मंदिर में उसकी कोई विशेष रूचि नहीं है।

टिकोरी ने दलिप को सरकारी बस के अंदर मिट्टी भरी बाटली जलाकर फेंकने के लिए कह दिया।

दलिप बेचारा भी बेरोजगारी के मार झेल ही रहा था। प्रधानमंत्री के ऊपर उसका गुस्सा और अधिक था। पिछले महीने ही एक बिल लाकर, उसकी जात को रिजर्व कोटा से हटा दिया गया था।

दलिप के बाटली फेंकते ही बस धूं - धूं करके जल उठी। पुलिस गस्त पर थी और दलिप दबोच लिया गया।

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बखानू बबा अपनी खटिया पर बैठकर आनेवाले चुनावों की रणनीति में फकीरी का मत ले रहें थे। तभी टिकोरी वहाँ दौड़ते हुए पहुँचा।

"बबा, आपके लिए एकदम चउचक खबर लाए हैं।"

"चल भाग यहाँ से मनहूस, पिछली बार बोला खबर चउचक है और पता चला था हमारी प्रधानी खतरे में पड़ गई।

"अरे बबा, इस बार खबर एकदम चउचक है?"

फकीरी ने जोर से एक बाँस का खूटा, टिकोरी पर फेंकते हुए कहा - अरे ससुर के नाती खबर सुनाओ।

"अब गाँव से शहर जाने के लिए रोडवेज वाले नई बस लायेंगे।"

फकीरी ने चहकते हुए कहा - चलो अच्छा हुआ, पुरानी बस से जाने पर जान का खतरा भी बना रहता था। अभी पिछली बार ही बस ब्रेक लगाने के बाद भी खंती में उतर गई थी। वो तो धनभाग थे हमारे की एक दो जगह धुंस चोट के अलावा कुछ नहीं हुआ।

बखानू बबा ने फकीरी को ओर देखा।

"कल ही चलकर एम पी साहब को धन्यवाद कर आतें हैं।"

टिकोरी अपनी जगह पर बंदर की तरह उछला - अरे वाह भाई, लंका में आग लगाए हम और क्रेडिट पूँछ को दिया जा रहा है।

बखानू बबा ने टिकोरी की तरफ तरेर के देखा और कुछ पूछनेवाले ही थे कि शालिक गरियाते हुए निकला।

"भाड़ में में जाए ऐसी सरकार, हमारा बेटा को कूट - कूटकर झेलंगा कर डाला।

टिकोरी ने हँसते हुए बखानू बबा की तरफ देखा।

"दलिप बोलता था ना कि सरसो पर बरधा हाँकने के लिए उसके पास टाइम नहीं है। आज उसको भी सबक सिखा दिए।"

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दलिप और टिकोरी को देखकर राजनीति का एक और सिद्धांत प्रतिपादित होता है।

"ऊँची कुर्सी पर बैठने के लिए गारे में मजबूती खून के रंग से लाई जाती है।"
- कमल उपाध्याय

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