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रावण और लोकतंत्र क्यों?

लंकापति का लोकतंत्र मेरी पहली किताब थी, जो मूलतः पहले प्रभु श्रीराम को केंद्र में रखकर मैंने लिखा था। लेकिन जल्द ही मुझे प्रकाशकों से इस बात का ज्ञान हो गया कि श्रीराम को केंद्र में रखकर व्यंग्य लिखना तो दूर सोचना भी पाप है। अब जद्दोजहद शुरू हुई, इस किताब को नया रूप देने की। श्रीराम की जगह रावण को मुख्य किरदार में रखकर, मैंने किताब को पुनः लिखना आरंभ किया। रावण और श्रीराम में बहुत बड़ा फर्क था तो श्रीराम के परिपेक्ष्य से जो करारा व्यंग्य था, वो रावण के परिपेक्ष्य से एक साधारण सी बात हो गई। आखिर श्रीराम मर्यादा पुरषोत्तम थे और रावण एक पराई स्त्री को हरण कर लेनेवाला।

श्रीराम से रावण की यात्रा में किताब के व्यंग्य ने अपनी कुछ - कुछ धार तो खो दी लेकिन अंततः प्रकाशक ने लंकापति का लोकतंत्र को प्रकाशित कर दिया। आप प्रकाशक की वेबसाइट पर पाठकों का प्रतिसाद देख सकतें हैं। कुछ लोग लंबे समय से भाग २ की माँग कर रहें थे। भाग दो मैंने लगभग - लगभग दो साल पहले लिखना आरंभ कर दिया था लेकिन फिर लॉकडाउन के चलते बहुत कुछ ठहर गया, जिसमें मेरी प्रतिदिन की लोकल यात्रा भी शमिल थी और उस यात्रा के समय मेरा लिखना।

रावण और लोकतंत्र अंततः आपके सामने प्रस्तुत है। यह लंकापति का लोकतंत्र से बिलकुल अलग है। लंकापति का लोकतंत्र कई व्यंग्य कहानियों को मिलाकर, बना एक संग्रह था जबकि रावण और लोकतंत्र एक कहानी है जहाँ रावण लोकतंत्र की लाला फीताशाही से परेशान है और धीरे - धीरे लंका को पुनः राजतन्त्र बनाना चाहता है। रावण के अपने ही लोग सत्ता सुख भोगने के लिए उसे सत्ता से बेदखल करने में लगें हैं। सबसे बड़ी बात "रावण और लोकतंत्र" साहित्य से बहुत दूर है। इसमें अंग्रेजी, मराठी, ठेठ, भोजपुरी, बंबईय्या और बॉलीवुड का भरपूर उपयोग हुआ है।

शेल्डन कूपर और बिग बैंग थ्योरी को साथ घसीटते हुए गुरुदत्त पर फिल्माया गीत "जाने वो कैसे लोग थे, जिनके प्यार को प्यार मिला" से होते हुए सखी सइयाँ तो खूब ही कमात हैं, तक के गीत को किताब में मौका मिला है। किताब पूर्णतः हास्य - व्यंग्य और मनोरंजन के लिए लिखी गई है। मैं इस किताब को लिखने के लिए मेरे मार्गदर्शकों श्री हरिशंकर परसाई, श्री शरद जोशी और श्रीलाल शुक्ला को बहुत धन्यवाद देता हूँ। यह किताब प्रभु श्रीराम और रावण को समर्पित है क्योंकि एक बड़ा नकारत्मक किरदार ही एक बड़े सकारात्मक किरदार के कद को बढ़ाता है।

पाठकों से निवेदन है कि कि इस किताब को भी वही प्यार दें जैसा आपने पहले भाग को दिया था।

धन्यवाद
कमल उपाध्याय